आज भी वो पुश्त पर मुर्दा दिया तारीक मशअ’ल को छुपाए ।

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आज भी वो पुश्त पर मुर्दा दिया तारीक मशअ’ल को छुपाए ।

उन नए लोगों के पीछे उन के क़दमों में लरज़ती रौशनियों के सहारे ।

ठोकरें खाता सँभलता सोचता है ।

रौशनी तो ख़ारिजी शय है ।

दिया है या भड़कती मिशअलें हैं ।

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आख़िरश ये रौशनी उन अजनबी लोगों की आँखों से उतर कर ।

उन के क़दमों से लिपट कर ।

चलने वाली रौशनी कैसी है कैसी रौशनी है।

ये घर बहुत अज़ीम था ।

ये घर बहुत हसीन था ।

कि उस के इर्द-गिर्द दूर दूर तक ।

कोई मकान उस से बढ़ के था नहीं ।

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मगर यहाँ का चख अजब रिवाज था ।

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