उस के बंदों को देख कर कहिए हम को उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे

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है और बात बहुत मेरी बात से आगे ।

ज़मीन ज़र्रा है इस काएनात से आगे ।

इक और सिलसिला-ए-हादसात है रौशन ।

इस एक सिलसिला-ए-हादसात से आगे ।

हवा-ए-अक्स-ए-बहार-ओ-ख़िज़ाँ नहीं है फ़क़त ।

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अगर निगाह करो फूल पात से आगे ।

ये हम जो पेट से ही सोचते हैं शाम ओ सहर ।

कभी तो जाएँगे इस दाल-भात से आगे ।

कुछ और तरह के अतराफ़ मुंतज़िर हैं कहीं ।

उठाएँ ज़हमत अगर शश-जहात से आगे ।

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न रोक पाए तग़य्युर की तेज़ तुग़्यानी ।।

जो बंद बाँधने आए सबात से आगे ।

कुएँ में बैठ के ही टरटरा गए कुछ दिन ।

नज़र पड़ा नहीं कुछ अपनी ज़ात से आगे ।

इस आब ओ रंग से बाहर भी इक तमाशा है ।

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चले-चलो जो नज़र की सिफ़ात से आगे ।

‘ज़फ़र’ ये दिन तो नतीजा है रात का यकसर ।

कुछ और ढूँडता रहता हूँ रात से आगे ।

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