कोरोना के इलाज को लेकर अब किया गया यह दावा? 17 साल पुरानी एंटीबाडी से हो सकते हैं ठीक

 

17 साल पुरानी एंटीबॉडी से कोविड-19 के वायरस का इलाज संभव है। साइंस एडवांसेज जर्नल में छपे एक वैज्ञानिक अध्ययन में यह चौंकाने वाला दावा किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि 2003 में फैले कोरोना वायरस की एंटीबॉडी से उन्हें चूहों में कोविड-19 संक्रमण को नष्ट करने में सफलता मिली है। 

गौरतलब है कि कोरोना वायरस के कई रूप दुनिया में मौजूद हैं, जिसमें एक रूप या स्ट्रेन ‘सार्स-कोव’ ने 2003 में संक्रमण फैलाया था जिससे भी बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हुए थे। शोधकर्ताओं ने इसी वायरस से संक्रमित हुए बीस मरीजों के शुक्राणुओं के नमूने इकट्ठे किए थे। जिसमें उस कोरोना वायरस के खिलाफ विकसित हुई एंटीबॉडी पायी गई। शोधकर्ताओं ने इन्हीं एंटीबॉडी का इस्तेमाल करके कल्चर्ड कोशिकाओं से वर्तमान कोरोना वायरस को नष्ट किया। कल्चर्ड कोशिका का मतलब प्रयोगशाला में ऐसी कोशिकाएं तैयार करने से है, जिन्हें कृत्रिम रूप से संक्रमित किया जाता है। इन कोशिकाओं को कोविड-19 के वायरस ‘सार्स-कोव-2’ से संक्रमित किया गया। 

पुराने कोरोना वायरस की एंटीबॉडी ज्यादा मजबूत 
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि 2003 में फैले कोरोना वायरस की एंटीबॉडी उस वायरस और हालिया वायरस के खिलाफ भी मजबूत प्रतिरक्षा प्रदान करती हैं। जबकि कोविड-19 के वायरस से पैदा होने वाली एंटीबॉडी की प्रतिरक्षा उतनी मजबूत नहीं है। इसका पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहे और खरगोशों को रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन विधि से सार्स-कोव वायरस की एंटीबॉडी दी। फिर उन्हें उसी कोरोना वायरस और उसके बाद कोविड-19 के वायरस से संक्रमित कराया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि 2003 वाले कोरोना वायरस की एंटीबॉडी से कोविड-19 के वायरस को उदासीन किया जा सका।  

 मायने — यूनिवर्सल टीका बनाने का रास्ता खुलेगा  
शोधकर्ता युआमी जू का कहना है कि इस शोध के परिणाम वैज्ञानिकों को ऐसा यूनिवर्सल टीका बनाने को प्रेरित करेंगे जिससे कोरोना वायरस की सभी प्रजातियों के वायरस के प्रति इंसानों में प्रतिरक्षा पैदा हो सके। उन्होंने पाया,  2003 वाले कोरोना वायरस की एंटीबॉडी प्रोटीन वर्तमान वायरस के चार प्रमुख अवयवों में से दो पर बहुत अधिक प्रभावी है और बाकी पर दो पर इसका असर कुछ कम है।  
 
एंटीबॉडी जल्दी नष्ट होना है अभी सबसे बड़ी चुनौती 
वर्तमान में कोविड-19 के वायरस की एंटीबॉडी को लेकर जितने शोध सामने आए हैं, उसमें एंटीबॉडी के अधिकतम तीन महीने तक शरीर में बने रहने की जानकारी दी गई है। जबकि 2003 वाले कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की एंटीबॉडी 17 साल तक बनी रहीं। 

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