कोरोना के साथ बढ़ा एक और खतरा, 20 रुपए में हो सकता है समाधान

दिल्ली की हवा दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। आलम यह है कि प्रदूषण ने लोगों का जीना मुहाल कर रखा है। राष्ट्रीय राजधानी की हवा की गुणवत्ता गुरुवार को ‘खराब’ श्रेणी में रही। इस बीच सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी वेदर फॉरकास्टिंग एंड रिसर्च (सफर) ने अपने पूवार्नुमान में कहा है कि एक्यूआई अगले तीन दिनों में रविवार तक और बिगड़ेगा। यह कोरोना वायरस से प्रभावित रोगियों के लिए गंभीर रूप से खतरनाक साबित हो सकता है।

ये है बड़ी वजह 

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तत्वावधान में सफर ने प्रदूषण बढ़ने के लिए आस-पास के राज्यों में पराली जलाए जाने को सबसे बड़ी वजह बताया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 7 अक्टूबर को सिनराइज्ड फायर काउंट 399 था। दिल्ली की ओर प्रदूषक तत्वों के परिवहन के लिए सीमा परतीय हवा की दिशा और गति दोनों अनुकूल है, लेकिन हवा की दिशा में बदलाव का अनुमान लगाया गया है, जिससे कुछ दिनों के लिए वायु गुणवत्ता के मध्यम श्रेणी में रहने की संभावना है। 

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, कुल 35 प्रदूषण निगरानी स्टेशनों में से 17 स्टेशनों में वायु गुणवत्ता सूचकांक खराब श्रेणी में है, जबकि 15 स्टेशनों ने सूचकांक को मध्यम श्रेणी में दर्ज किया, वहीं चार काम नहीं कर रहे थे। दिल्ली टेक्निकल यूनिवर्सिटी के पास के क्षेत्र में एक्यूआई सर्वाधिक 290 दर्ज किया गया।

पराली से हर बार नुकसान 

उत्तरी राज्यों में पराली (Parali) जलने के कारण हर सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण बढ़ जाता है और प्रदूषक तत्व वायुमंडल के निचले स्तर में पानी की बूंदों के साथ मिलकर घने कोहरे की एक मोटी परत बनाते हैं, जिससे निवासियों के स्वास्थ्य को खतरा पैदा होता है। दिल्ली के आसपास के कृषि प्रधान राज्यों में पराली के जलने से अत्यधिक प्रदूषण फैलता है। किसान अक्टूबर में धान की फसल काट लेते हैं, जो गेहूं की बुवाई के अगले दौर से लगभग तीन सप्ताह पहले पराली जलाना शुरू कर देते हैं।

सस्ते श्रमिकों की कमी के कारण और मशीन से फसल की कटाई के बाद पराली बच जाती है, जिसे नष्ट करने के लिए किसान सबसे आसान विकल्प का सहारा लेते हैं, यानी पराली को खेतों में जला देते हैं। शहर में खराब वायु गुणवत्ता के कारण अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो रही हैं। पिछले साल पराली का धुआं आने के बाद सांस लेने में तकलीफ बताने वाले मरीजों की संख्या में बाकी सालों की तुलना में 30-35 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। 

महज 20 रुपए में है समाधान 

दिल्ली के पूसा स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र के तरफ से पराली को बिना जलाए कम्पोस्ट बनाने की तकनीक इस समस्या के निदान में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। यह तकनीक पूसा डी-कंपोजर कही जाती है। इस तकनीक में फसल वाले खेतों में छिड़काव किया जाता है। 8-10 दिनों में फसल के डंठल के विघटन को सुनिश्चित करने और जलाने की आवश्यकता को रोकने के लिए खेतों में छिड़काव किया जाता है। बताया गया है कि कैप्सूल की लागत केवल 20 रुपए प्रति एकड़ है और प्रभावी रूप से प्रति एकड़ 4-5 टन कच्चे भूसे का निस्तारण किया जा सकता है। 

हाल ही पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम के लिए बनी बायो डी-कंपोजर तकनीक का जायजा लेने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल गुरुवार को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा का दौरा किया था और इस तकनीक के बारे में जानकारी ली। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने पराली से खेत में ही सीधे खाद बनाने की बायो डी-कंपोजर तकनीक  की मदद से खेतों में पराली जलाने की समस्या का समाधान होने की उम्मीद है।

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