ग्राउंड रिपोर्टः सरकारें बदलीं, पर जिंदगी नहीं, रोजी-रोटी के लिए फुटपाथ पर बसर करने वालों का दर्द

 लाखों रोजगार और तमाम सुविधाओं के वादों के बीच लाखों लोग ऐसे हैं जो अपनी पूरी जिंदगी सड़कों पर ही गुजार देते हैं। रोज की आमदनी का ठिकाना न होने से तीज-त्योहार पर आमदनी का इंतजार रहता है।

राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड के दफ्तर के बीच फुटपाथ पर फूलो देवी बच्चों संग मिट्टी के चूल्हे बना रही हैं। इसे वह छठ के त्योहार में बेचेंगी। गीली मिट्टी से चूल्हे को आकार देती हुई फूलो बताती हैं, हमारा कोई घर-दुआर नहीं है। छठ से एक महीने पहले से चूल्हा बनाने लगते हैं, उसे बेचकर बच्चों के लिए राशन का जुगाड़ कर पाते हैं। जब चूल्हे का काम नहीं होता तो फूलो के पति और बच्चे शीशा, कप और गिलास बेचते हैं। लॉकडाउन के बाद यहां फूलो जैसे फुटपाथ पर रोजी का जुगाड़ करने वालों की संख्या काफी बढ़ गई है।

राज्य की प्रतिव्यक्ति आय 3,650 रुपये है, जो भारत की औसत प्रति व्यक्ति आय 11,625 रुपये से करीब एक तिहाई है। बिहार के करीब 39 फीसदी लोग निरक्षर हैं। कुल निरक्षर लोगों में महिलाएं 49 फीसदी है। फूलो की तरह ही थोड़ी दूर पर एक युवा चाय बेचते मिले, उसे हमेशा डर रहता है कि न जाने कब नगर निगम वाले इनकी दुकान उजाड़ दें। चाय ठेली के पास खड़े विक्की कुमार बताते हैं, सरकार ऐसी हो कि कुछ रोजी-रोटी का जुगाड़ हो।

पटना में जेडीयू दफ्तर के सामने साइकिल पंचर की दुकान चलाने वाले अरवल की मुस्लिम पट्टी में रहने वाले मो. असगर लॉकडाउन के दौरान अपनी आपबीती सुनाते हैं, न राशन मिला, न ही खाना। काम भले न कर पाएं हों लेकिन इन नेताओं ने सभी को जाति में अलग-अलग बांट दिया। इसी तरह, वैशाली जिले के बागमली चौराहे पर चाय की दुकान चलाने वाले बबलू को दुकान से हर रोज करीब 200 रुपये की कमाई हो जाती है, लेकिन परिवार में आठ लोग होने से गुजारा जैसे-तैसे ही हो पाता।

बिहार से करीब 40 लाख लोग रोजी-रोटी की तलाश में बाहर चले जाते हैं, लेकिन कोरोना काल में ज्यादातर लौट आए, उसके बाद से फुटपाथ और सड़कों पर रोजी तलाशने वालों की संख्या ऐसे ही बढ़ी है। मुजफ्फरपुर के कंपनीबाग इलाके में एक लाइन से फुटपाथ पर कपड़े की दुकान सजना हर रोज का काम है। इन दुकानदारों को कमाई के लिए त्योहारों का इंतजार होता है। यहीं पर अपनी दुकान पर बैठे फहीमुद्दीन किसी बड़ी दुकान से रेडीमेड कपड़े खरीदकर लाते हैं, जब कपड़े बिकते हैं तो जाकर हिसाब करते हैं। फहीमुद्दीन बताते हैं, सात बच्चे हैं, धंधा मंदा है, हर रोज दो से ढाई सौ रुपये कमा लेते हैं। बच्चे भी कभी मौके पर काम कर लेते हैं।

गरीब को रोजागर मिले और भर पेट रोटी मिल जाए। जो भी सरकार आए इसके बारे में सोचे। फहीमुद्दीन की दुकान के बगल में बैठे वीरेंद्र कुमार भी 25 साल से फुटपाथ पर दुकान लगाते हैं, वीरेंद्र को डर रहता है कि कहीं कोई आ के दुकान उजाड़ न दे। हम लोगों को एक जगह अगर स्थायी जगह मिल जाए तो आसान हो जाए। पिछले दस साल से पैसे नहीं लिए जा रहे। एक दुकान पर दो लोग काम करते हैं, और 300 रुपये की आमदनी होती है। लॉकडाउन में पूंजी खर्च हो गई, अब कर्ज लेकर फिर शुरू किया है।

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